सदियों पहले, हिमालय की गोद में बसे एक घने वन में वज्रनाथ नामक एक साधक रहता था। वह एक महान तपस्वी था, जिसने सांसारिक मोह-माया को त्याग कर तंत्र साधना का मार्ग अपनाया था। उसकी एक ही अभिलाषा थी—परम सत्य की प्राप्ति और आत्मज्ञान।
तपस्या का आरंभ:
वज्रनाथ एक प्राचीन शिव मंदिर के पास कुटिया बनाकर रहने लगा। वह प्रतिदिन ध्यान और साधना में लीन रहता। उसकी उपासना का एकमात्र उद्देश्य था भगवान भैरव का साक्षात्कार। घोर तपस्या करते-करते उसकी साधना इतनी शक्तिशाली हो गई कि उसे अलौकिक अनुभव होने लगे। कभी वह दिव्य प्रकाश देखता, तो कभी उसे अनसुनी ध्वनियाँ सुनाई देतीं। लेकिन उसने न तो भय को स्थान दिया और न ही अहंकार को।
उसकी तपस्या की अग्नि प्रज्वलित होती रही। उसने न केवल मंत्रों का जाप किया बल्कि अपनी इंद्रियों पर भी नियंत्रण पाया। दिन-रात, गर्मी-सर्दी की परवाह किए बिना, वह एकमात्र लक्ष्य की ओर बढ़ता रहा—भैरव का साक्षात्कार।
भैरव का प्रकट होना:
अनेक वर्षों की कठिन साधना के पश्चात एक अमावस्या की रात जब पूरा जंगल घने अंधकार में डूबा था, वज्रनाथ अपनी ध्यान मुद्रा में बैठा हुआ था। वह पूर्णतः समाधिस्थ था, जब अचानक वायुमंडल में एक तीव्र ऊर्जा प्रवाहित होने लगी। वातावरण में गूंजती हुई तंत्र-मंत्र की ध्वनियाँ और बिजली की चमक ने पूरे जंगल को भयावह बना दिया।
तभी एक दिव्य प्रकाश प्रकट हुआ और उसमें से भगवान भैरव प्रकट हुए। वे रुद्र रूप में थे—तीसरी आँख से विकराल ऊर्जा प्रवाहित हो रही थी, गले में नरमुंडों की माला, हाथ में त्रिशूल और खड्ग। उनका स्वर गर्जना से भरा था, परंतु उसमें दिव्यता भी थी।
उन्होंने वज्रनाथ की ओर देखा और गंभीर स्वर में बोले, “सत्य की राह कठिन है, भय त्यागो।”
वज्रनाथ का हृदय श्रद्धा से भर गया। उसने प्रणाम कर कहा, “भगवान! मैं वर्षों से आपकी साधना कर रहा हूँ। कृपया मुझे ज्ञान प्रदान करें, जिससे मैं अपने भीतर की अज्ञानता को दूर कर सकूँ।”
तंत्र का ज्ञान और भय का नाश
भैरव मुस्कुराए और बोले, "तंत्र केवल शक्ति प्राप्त करने का साधन नहीं है, यह आत्मज्ञान की कुंजी भी है। जो इसे केवल शक्ति के लिए अपनाते हैं, वे अधूरी यात्रा में ही खो जाते हैं। किंतु जो इसे सत्य की खोज में अपनाते हैं, वे स्वयं शिव से एकरूप हो जाते हैं।"
वज्रनाथ ध्यानपूर्वक सुन रहा था। भैरव ने आगे कहा, "शक्ति और शिव एक हैं। जब तक साधक भीतर के भय से मुक्त नहीं होता, तब तक वह पूर्ण ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। भय वह अवरोध है, जो आत्मा को सत्य से दूर रखता है।"
वज्रनाथ ने भैरव के वचनों को हृदय से स्वीकार किया। उसने निश्चय किया कि अब वह न केवल बाहरी शक्ति की खोज करेगा, बल्कि अपने भीतर के अज्ञान और भय का भी नाश करेगा।
अज्ञान पर विजय:
भैरव के दर्शन के पश्चात वज्रनाथ की साधना में और अधिक तीव्रता आ गई। उसने अपने भीतर के समस्त भय को जड़ से समाप्त कर दिया। अब वह मृत्यु से भी नहीं डरता था, क्योंकि उसने समझ लिया था कि जीवन और मृत्यु केवल भ्रम हैं।
धीरे-धीरे, उसकी साधना इतनी सिद्ध हो गई कि वह प्रकृति की गूढ़ शक्तियों को समझने लगा। उसे ब्रह्मांड के रहस्यों का ज्ञान प्राप्त होने लगा। वह अब मात्र एक साधक नहीं, बल्कि एक सिद्ध योगी बन चुका था।
लोक कल्याण की ओर अग्रसर:
अपने आत्मज्ञान की प्राप्ति के पश्चात वज्रनाथ ने संकल्प लिया कि वह इस ज्ञान को लोक कल्याण के लिए प्रयोग करेगा। वह अपने आश्रम में आने वाले शिष्यों को भैरव तंत्र का वास्तविक उद्देश्य समझाने लगा। वह लोगों को यह सिखाने लगा कि तंत्र केवल चमत्कारों या शक्ति अर्जित करने के लिए नहीं, बल्कि आत्म-ज्ञान और आत्म-विकास के लिए है।
धीरे-धीरे, उसकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई। लोग उसे सिद्ध वज्रनाथ के नाम से जानने लगे। उन्होंने अनेकों को भयमुक्त जीवन जीने की शिक्षा दी और भैरव तंत्र के गूढ़ रहस्यों को समझाकर उन्हें आत्मज्ञान की ओर प्रेरित किया।
कथा से मिलने वाली शिक्षा:
यह कथा हमें सिखाती है कि तंत्र साधना केवल शक्ति प्राप्ति के लिए नहीं होती, बल्कि आत्मज्ञान के लिए होती है। भय को त्यागकर ही हम सत्य के मार्ग पर अग्रसर हो सकते हैं। भैरव तंत्र हमें यह ज्ञान देता है कि शक्ति और शिव एक ही हैं, और जब हम अपने भीतर की शक्तियों को जाग्रत कर लेते हैं, तो कोई भी अज्ञान या भय हमें रोक नहीं सकता।
वज्रनाथ की तरह यदि हम भी अपने अंदर के भय को समाप्त कर दें और सत्य की खोज में दृढ़ निश्चय कर लें, तो आत्मज्ञान की प्राप्ति संभव है।
सत्य की राह कठिन है, लेकिन जो इसे धैर्य और श्रद्धा से अपनाता है, वही वास्तविक आनंद और मुक्ति को प्राप्त करता है।
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